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चम्पारण| History of Bihar | Part-2

चम्पारण| History of Bihar | Part-2
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चंपारण बिहार राज्य का एक जिला था। अब पूर्वी चंपारण और पश्चिमी चंपारण नाम के दो जिले हैं। भारत और नेपाल की सीमा से लगा यह क्षेत्र स्वाधीनता संग्राम के दौरान काफी सक्रिय रहा है।

चंपारण का नाम चंपा + अरण्य से बना है जिसका अर्थ होता है- चम्‍पा के पेड़ों से आच्‍छादित जंगल। महात्मा गाँधी ने अपना पहला आंदोलन  यहीं से अंग्रेजों के खिलाफ नील आंदोलन से किया था।

बेतिया पश्चिमी चंपारण का जिला मुख्यालय है और मोतिहारी पूर्वी चम्पारण का।

चंपारण से 35 किलोमीटर दूर दक्षिण साहेबगंज-चकिया मार्ग पर लाल छपरा चौक के पास अवस्थित है प्राचीन ऐतिहासिक स्थल केसरिया।

यहाँ एक वृहद् बौद्धकालीन स्तूप है जिसे केसरिया स्तूप के नाम से जाना जाता है।

चंपारण का इतिहास बहुत गौरवपूर्ण एवं महत्वपूर्ण रहा है। पुराण में वर्णित है कि यहाँ के राजा उत्तानपाद के पुत्र भक्त ध्रुव ने यहाँ के तपोवन नामक स्थान पर ज्ञान प्राप्ति के लिए घोर तपस्या की थी। 

एक ओर चंपारण की भूमि देवी सीता की शरणस्थली होने से पवित्र है वहीं दूसरी ओर आधुनिक भारत में गाँधीजी का चंपारण सत्याग्रह भारतीय स्वतंत्रता के इतिहास का अमूल्य पन्ना है।

राजा जनक के समय यह मिथिला (तिरहुत) प्रदेश का अंग था। लोगों का ऐसा विश्वास है कि जानकीगढ, जिसे चानकीगढ भी कहा जाता है, राजा जनक के मिथिला प्रदेश की राजधानी थी।

जो बाद में छठी सदी ईसापूर्व में वज्जी के साम्राज्य का हिस्सा बन गया। भगवान बुद्ध ने यहाँ अपना उपदेश दिया था जिसकी याद में तीसरी सदी ईसापूर्व में प्रियदर्शी अशोक ने स्तंभ लगवाए और स्तूप का निर्माण कराया।

गुप्त वंश तथा पाल वंश के पतन के बाद चंपारण कर्नाट वंश के अधीन हो गया। मुसलमानों के अधीन होने तक तथा उसके बाद भी यहाँ स्थानीय क्षत्रपों का सीधा शासन रहा।

पूर्वी चम्पारण 

पूर्वी चंपारण बिहार के तिरहुत प्रमंडल का एक जिला है। चंपारण को विभाजित कर 1971 में बनाए गए पूर्वी चंपारण का मुख्यालय मोतिहारी है।

पूर्वी चम्‍पारण के उत्‍तर में एक ओर जहाँ नेपाल तथा दक्षिण में मुजफ्फरपुर स्थित है, वहीं दूसरी ओर इसके पूर्व में शिवहर और सीतामढ़ी तथा पश्चिम में पश्चिमी चम्‍पारण जिला है।
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यहाँ के पर्यटक स्थल 

केसरिया का बौद्ध स्‍तूप
Champaran, History of bihar

मोतिहारी से 35 किलोमीटर दूर साहेबगंज-चकिया मार्ग पर लाल छपरा चौक के पास अवस्थित है प्राचीन ऐतिहासिक स्थल केसरिया। यहाँ एक वृहद् बौद्धकालीन स्तूप है जिसे केसरिया स्तूप के नाम से जाना जाता है।

1998 में भारतीय पुरातत्‍व विभाग द्वारा उत्‍खनन के उपरांत इस जगह का पर्यटन और ऐतिहासिक रूप से महत्‍व बढ़ गया है। पुरातत्ववेत्‍ताओं के अनुसार यह बौद्ध स्‍तूप दुनिया की सबसे ऊँचा स्‍तूप है।

 यह स्‍थान राजधानी पटना से 120 किलोमीटर और वैशाली से 30 मील दूर है। मूल रूप में 150फीट ऊँचे इस स्‍तूप की ऊँचाई सन 1934 में आए भयानक भूकंप से पहले 123 फीट थी।

भारतीय पुरातत्‍वेत्‍ताओं के अनुसार जावा का बोराबुदूर स्‍तूप वर्तमान में जहाँ 103 फीट ऊँचा है वहीं केसरिया स्थित इस स्‍तूप की ऊंचाई 104 फीट है। विश्‍व धरोहर में शामिल सांची का स्‍तूप की ऊंचाई 77.50 फीट ही है।

इसके ऐतिहासिक महत्‍व को देखते हुए बिहार सरकार केंद्र की मदद से इसे एक ऐतिहासिक पर्यटक स्‍थल के रूप में वि‍कसित करने की योजना बना रही है। बिहार पर्यटन में केसरिया का महत्‍व बढ़ता ही जा रहा है।

लौरिया गॉंव (अशोक स्तम्भ )

अरेराज अनुमंडल के लौरिया गांव में स्थित अशोक स्‍तंभ की ऊंचाई 36.5 फीट है। इस स्‍तंभ (बलुआ पत्‍थर से बना हुआ ) का निर्माण 249 ईसा पूर्व सम्राट अशोक के द्वारा किया गया था।

इसपर प्रियदर्शी अशोक लिखा हुआ है। इसके आधार का व्‍यास 41.8 इंच तथा शिखर का व्‍यास 37.6 इंच है। इस स्‍तंभ को स्‍तंभ धर्मलेख' के नाम से भी जाना जाता है।

सम्राट अशोक ने इसमें अपने 6 आदेशों के संबंध में लिखा है। स्‍तंभ का वजन (जमीन से ऊपर का हिस्‍सा) 34 टन के आसपास है। अनुमान के अनुसार इस स्‍तंभ का कुल वजन 40 टन है।

कहा जाता है कि इस स्‍तंभ के ऊपर जानवर की मूर्ति थी जिसको कोलकाता संग्रहालय भेज दिया गया है। इस स्‍तंभ पर लिखा हुआ आदेश 18 लाइनों में है।

गाँधी स्मारक (मोतिहारी)

चम्‍पारण की शान का प्रतीक गांधी मेमोरियल स्‍तंभ का शिलान्‍यास 10 जून 1972 को राज्‍यपाल डी.के. बरूच के द्वारा किया गया था।

18 अप्रैल 1978 को वरिष्‍ठ गांधीवादी विद्याकर कवि ने इस स्‍तंभ को राष्‍ट्र को समर्पित किया। इस स्‍तंभ का निर्माण महात्‍मा गांधी के चंपारण सत्‍याग्रह की याद में शांति निकेतन के मशहूर कलाकार नन्‍द लाल बोस के द्वारा किया गया।

चुनार पत्‍थर से निर्मित इस स्‍तंभ की लंबाई 48 फीट है। स्मारक का निर्माण ठीक उसी जगह किया गया है जहां गाँधीजी को 18 अप्रैल 1917 में धारा 144 का उल्‍लंघन करने के जुर्म में अनुमंडलाधिकारी की अदालत में पेश किया गया था।
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जॉर्ज ऑरवेल स्मारक

अंग्रेजी साहित्य के महान लेखक जॉर्ज ऑरवेल का जन्म 25 जून 1903 को मोतिहारी में हुआ था। उस समय उनके पिता रिचर्ड वेल्मेज्ली ब्लेयर चंपारण के अफीम विभाग में सिविल अधिकारी थे।

जन्म के कुछ दिनों के बाद ऑरवेल अपनी माँ और बहन के साथ इंगलैंड चले गए जहाँ उन्होंने विद्यार्थी जीवन से ही लेखन आरंभ किया। उनकी लिखी Animal Farm, Burmese Days, A Hanging जैसी कुछ पुस्तकें अंग्रेजी साहित्य की महान कृति है।

वर्ष 2004 में रोटरी क्लब मोतिहारी तथा जिला प्रशासन के प्रयास से उनके जन्म स्थल की दशा सुधार कर वहाँ एक फलक लगाया गया जिसपर उनका संक्षिप्त जीवन चरित लिखा है।

विश्व कबीर शांति स्तंभ, बेलवातिया

जिला मुख्यालय से दस किलो मीटर पर पीपराकोठी प्रखंड के बेलवातिया गांव में पूरे भारत का आठवां एवं बिहार का अब तक इकलौता विश्व कबीर शांति स्तंभ स्थापित है इस स्तंभ का निर्माण तत्कालीन महंत स्व० रामस्नेही दास ने 2002 में किया

जबकि यह आश्रम 1875  ई० में तत्कालीन महंत स्व० केशव साहेब ने स्थापित किया इस स्तंभ के अलावा अन्य सभी स्तंभ मध्य प्रदेश शासन के द्वारा बनाये गए है इस आश्रम पर प्रति वर्ष अनंत चतुर्दशी को त्रिदिवाशिये संत सम्मेलन का आयोजन किया जाता है

 जिसमे देश विदेश के संत महात्मा भक्त का समागम होता है यह आश्रम धार्मिक समाजिक राजनैतिक व अध्यात्मिक साधना का केंद्र रहा है 

वर्तमान महंथ डॉ त्रिपुरारी दास के नेतृत्व में इस आश्रम का संचालन किया जा रहा है जिनके द्वारा देश विदेश में इस आश्रम के विकास के लिये प्रयास किया जा रहा है।

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पश्चिमी चंपारण

पश्चिमी चंपारण बिहार के तिरहुत प्रमंडल के अंतर्गत भोजपुरी भाषी जिला है। हिमालय के तराई प्रदेश में बसा यह ऐतिहासिक जिला जल एवं वनसंपदा से पूर्ण है।

बेतिया जिले का मुख्यालय शहर हैं। बिहार का यह जिला अपनी भौगोलिक विशेषताओं और इतिहास के लिए विशिष्ट स्थान रखता है। महात्मा गाँधी ने यहीं से अंग्रेजों के खिलाफ नील आंदोलन से सत्याग्रह की मशाल जलायी थी।

पश्चिमी चम्‍पारण के उत्तर में नेपाल तथा दक्षिण में गोपालगंज जिला स्थित है। इसके पूर्व में पूर्वी चंपारण है जबकि पश्चिम में इसकी सीमा उत्तर प्रदेश के पडरौना तथा देवरिया जिला से लगती है।

जिले का क्षेत्रफल 5228 वर्ग किलोमीटर है जो बिहार के जिलों में प्रथम है। जिले की अंतरराष्ट्रीय सीमा बगहा-1, बगहा-2, गौनहा, मैनाटांड, रामनगर तथा सिकटा प्रखंड के 35 किलोमीटर तक उत्तर-पश्चिम से दक्षिण-पूर्व में नेपाल के साथ लगती है।

यहाँ के पर्यटक स्थल 

बाल्मिकीनगर राष्ट्रीय उद्यान एवं बाघ अभयारण्य

लगभग 880 वर्ग किलोमीटर से अधिक क्षेत्र में फैला बिहार का एक मात्र राष्ट्रीय उद्यान नेपाल के राजकीय चितवन नेशनल पार्क से सटा है।

बेतिया से 80 किलोमीटर दूर बाल्मिकीनगर के इस राष्ट्रीय उद्यान का भीतरी 335 वर्ग किलोमीटर हिस्से को 1990 में देश का 18 वाँ बाघ अभयारण्य बनाया गया।

हिरण, चीतल, साँभर, तेंदुआ, नीलगाय, जंगली बिल्ली जैसे जंगली पशुओं के अलावे चितवन नेशनल पार्क से एकसिंगी गैडा औ‍र जंगली भैंसा भी उद्यान में दिखाई देते है।

त्रिवेणी संगम तथा बावनगढी

एक ओर नेपाल का त्रिवेणी गाँव तथा दूसरी ओर चंपारण का भैंसालोटन गाँव के बीच नेपाल की सीमा पर बाल्मिकीनगर से 5 किलोमीटर की दूरी पर त्रिवेणी संगम है।

यहाँ गंडक के साथ पंचनद तथा सोनहा नदी का मिलन होता है। श्रीमदभागवत पुराण के अनुसार विष्णु के प्रिय भक्त 'गज' और 'ग्राह' की लड़ाई इसी स्थल से शुरु हुई थी जिसका अंत हाजीपुर के निकट कोनहारा घाट पर हुआ था।

हरिहरक्षेत्र की तरह प्रत्येक वर्ष माघ संक्रांति को यहाँ मेला लगता है। त्रिवेणी से 8 किलोमीटर दूर बगहा-2 प्रखंड के दरवाबारी गाँव के पास बावनगढी किले का खंडहर मौजूद है।

पास ही तिरेपन बाजार है। इस प्राचीन किले के पुरातात्विक महत्व के बारे में तथ्यपूर्ण जानकारी का अभाव है।

भिखना ठोढी

जिले के उत्तर में गौनहा प्रखंड स्थित भिखना ठोढी नरकटियागंज-भिखना ठोढी रेलखंड का अंतिम स्टेशन है। नेपाल की सीमा पर बसा यह छोटी सी जगह अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए चर्चित है।

जाड़े के दिनों में यहाँ से हिमालय की हिमाच्छादित धवल चोटियाँ एवं अन्नपूर्णा श्रेणी साफ दिखाई देता है। यहाँ के शांत एवं मनोहारी परिवेश का आनंद इंगलैंड के राजा जॉर्ज पंचम ने भी लिया था। ब्रिटिस कालीन पुराने बंगले के अलावे यहाँ ठहरने की कई जगहें है।

बाल्मिकीनगर आश्रम और गंडक परियोजना

वाल्मिकीनगर राष्ट्रीय उद्यान के एक छोड़ पर महर्षि बाल्मिकी का वह आश्रम है जहाँ राम के त्यागे जाने के बाद देवी सीता ने आश्रय लिया था। सीता ने यहीं अपने 'लव' और 'कुश' दो पुत्रों को जन्म दिया था।

महर्षि वाल्मिकी ने हिंदू महाकाव्य रामायण की रचना भी यहीं की थी। आश्रम के मनोरम परिवेश के पास ही गंडक नदी पर बनी बहुद्देशीय परियोजना है जहाँ 15 मेगावाट बिजली का उत्पादन होता है

और यहाँ से निकाली गयी नहरें चंपारण के अतिरिक्त उत्तर प्रदेश के बड़े हिस्से में सिंचाई की जाती है। गंडक बैराज के आसपास का शांत परिवेश चित्ताकर्षक है। बेतिया राज के द्वारा बनवाया गया शिव-पार्वती मंदिर भी दर्शनीय है।

चम्पारण में हुए आंदोलन की जानकारी अगले  पोस्ट में दिया जाएगा ,तो हमारे हर पोस्ट को जरूर पढ़े ,साथ ही शेयर और कमैंट्स करना न भूले !!!!!!

                                               
    तो मिलते है चम्पारण आंदोलन की जानकारी के साथ अगले पोस्ट में। .....  


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