सिंधु घाटी सभ्यता| Indian History
सिंधु घाटी सभ्यता को हड़प्पा सभ्यता के नाम से भी जानते हैं।
अक्सर इसके इतिहासकार में इसकी उत्कृष्टता को लेकर विवाद भी रहा है जैसे कुछ इतिहासकार ने इसकी खोज की अवधि 3250 ईसा पूर्व - 2750 ईसा पूर्व बताई है,
इसका प्रतिपादन सर जॉन मार्शल ने किया है। वे पुरे विभाग के प्रमुख कार्यकर्ता थे। जबकि डीपी अग्रवाल ने वही अवधि 2300 -1750 ईसा पूर्व बताई है, जो की कार्बन -14 पद्धति पर आधारित है। इसलिए यह माना जाता है कि यह बहुत महत्वपूर्ण है।
हालांकि अलग अलग विद्वानों ने इसकी अवधि अलग अलग बताई है। अंत में 2500 -1700 के बिच इसका काल मुख्य रूप से माना जाता है।
ब्रिटिश काल के एक व्यक्ति जिसका नाम था चार्ल्स मैसन था, उन्होंने पाकिस्तान का दौड़ा किया और हड़प्पा क्षेत्र के बारे में इन्हे कुछ जानकारी मिली उन्होंने अनुमान लगाया की यहाँ कोई सभ्यता है, ये घटना 1828 की है।
इन्होंने ने एक पत्रिका निकाली थी, जिसका नाम नैरेटिव ऑफ ट्रैवल्स था इसी पत्रिका में उन्होंने इसके बारे में पहली बार जानकारी दी थी जो बाद में धीरे धीरे फैलने लगी।
इसके बाद 1856 ई o के असपास लाहौर और करांची में रेलवे लाइन बिछाई जा रही थी जिसमें दो इंजीनियर जो भाई भी थे, काम कर रहे थे। जेम्स कर्टन और विलियम कर्टन इन्हे खुदाई के समय वह ईटे मिले जिन्हे इन्होने रेलवे लाइन बिछाने में प्रयोग कर रहे हैं इन्हे ये तो पता चला यहाँ कोई सभ्यता होगी लेकिन इनहोने ज्यादा जानने का प्रयास नहीं किया।
पहली बार यहां शोध करने का प्रयास अलेक्जेंडर कनिंघम ने किया है। 1853 -1856 के बिच में इनहोने कई बार हड़प्पा क्षेत्र का दौरा किया और इस क्षेत्र में इसे जानने का प्रयास किया। लेकिन ये भी उतने सफल नहीं हो पाए।
अंतिम 1921 में भारत के पुरातात्विक विभाग के हेड सर जॉन मार्शल के नेतृत्व में इसकी खुदाई का काम शुरू हुआ और खुदाई करने वाले दो भारतीय अभियोजक थे, रायबहादुर दयाराम सहनी के नेतृत्व में हड़प्पा और राखल दास बनर्जी के नेतृत्व में मोहनजोदारो की खोज की गयी।
सिंधु घाटी सभ्यता का नाम सिंधु सभ्यता उसके सिंधु नदी के तट पर होने के कारण से परे। इतिहास में एक प्रथा प्रचलित हो रही है, की अगर सभ्यता के नामकरण किसी प्रकार की समस्या आती है, तो उस सभ्यता का नाम उस स्थल के नाम पर रखा जाएगा जिसकी खोज सबसे पहले हुई हो,
सबसे पहले इस सभ्यता की खोज दयाराम साहनी ने 1921 में की थी। सबसे पहले हड़प्पा नामक नगर की खोज की थी। इस प्रकार इसका एक नाम हड़प्पा सभ्यता है।
वर्तमान में ये पाकिस्तान में है। इसके निर्माण की कहानी को भी इतिहासकार में अंतर है। विदेशी इतिहासकारो का मानना है की इस सभ्यता का निर्माण सुमेरियनों ने किया है , इसे मानने वालो में प्रमुख मार्शल , ह्वीलर, चाइल्ड और डी.डी. कौशाम्बी हैं।
जवकि भारतीय इतिहासकार और कुछ विदेशी इतिहासकार ने भी यह माना है की सिंधु घाटी सभ्यता के निर्माता भारतीय थे। ये एक नगरीय सभ्यता थी। इसे कास्ययुगींन सभ्यता भी कहते है।
ये आद्य ऐतिहासिक सभ्यता थी। इसकी एक विशेषता यह भी थी की ये एक शांतिप्रिय सभ्यता थी। पूरी खुदाई के दौरान एक भी अश्त्र शास्त्र नहीं मिले है जिससे यह अनुमान लगाया जा सकता है की यह एक शांतिप्रिय सभ्यता थी।
ये व्यापार प्रधान सभ्यता थी। इस सभ्यता का विस्तार बहुत बड़े क्षेत्र में था , जितनी बड़ी सभ्यता मिस्त्र और निल मिलाकर नहीं थी उससे बड़ी सभ्यता थी सिंधु घाटी सभ्यता।
सिंधु घाटी सभ्यता की विस्तार
हड़प्पा सभय्ता के 1000 के लगभग स्थल भारत में और 500 के लगभग स्थल पाकिस्तान में स्थित है , लेकिन यहां आपको कुछ महत्वपूर्ण स्थल बता रहे है , जैसे अफगानिस्तान में सिंधु घाटी सभ्यता के दो अवशेष मिले हैं।- शोतुबोई और
- मुण्डीकाक
बलूचिस्तान क्षेत्र में सुटकागेंडोर है जो दाश्क नदी के तट पर है ,इसमें बालाकोट और डाबरकोट भी स्थित है ।
भारत में जम्मू -कश्मीर में स्थित मांदा सिंधु सभ्यता का सबसे उत्तरी स्थल है जो चिनाब नदी के तट पर स्थित है।
भारत में पंजाब में रोपड़ और संघोल पाया गया है। हरियाणा में बनवाली हैं। यहां से मिट्टी के और हल के और बैलगाड़ी के खिलोने के प्रमाण मिले है ,और यहां राखीगढ़ी भी पाए गए हैं।जो भारत में प्राप्त सिंधु घाटी स्थल में सबसे बड़ा स्थल है।
राजस्थान में गए स्थलों में प्रमुख हैं कालीबंगन और बालाथल। कालीबंगन से जुटे हुए खेत और अग्निकुंड की जानकारी भी हमे कालीबंगन से प्राप्त होती है। उत्तरप्रदेश में आलमगीरपुर पाए गए हैं जो हिंडन नदी के किनारे है । महाराष्ट्र में दाईमाबाद जो की सैंधव सभ्यता का सबसे दक्षिणी छोर है ये गोदावरी नदी के तट पर है।
गुजरात में लोथल स्थित है , जो सिंधु घाटी सभ्यता का बंदरगाह था। यहां से चावल के प्रमाण मिले हैं। कक्ष में स्थित धोलावीरा एक सुव्यवस्थित नगर थे , जो तीन भागो में विभाजित थे। यहां से लकड़ी की नालियां मिली हैं। घोड़े के अस्थि भी गुजरात के धोलावीरा से प्राप्त होती है। चावल के अवशेष लोथल के अलावा रंगपुर में भी मिले हैं। ये एक नगरीय सभ्यता थी जो ग्रिड पद्धति पर आधारित थी।
शहर दो वर्गों में बटे थे , पूर्वी नगर और पश्चिमी नगर। यहाँ के घर ईंटो के बने थे , उन ईंटो का अनुपात 4 :2 :1 था।
मोहनजोदड़ो में एक स्नानागार प्राप्त हुआ है जिससे अनुमान लगाया जाता है की वह एक सामूहिक स्नानागार रहा होगा जिसके आस पास छोटे -छोटे स्नानागार पाए गए है जिससे अनुमान लगाया जाता है की लोग वहां कपड़े चेंज करते होंगे और फिर सामूहिक कार्यक्रम में सम्मिलित होते होंगे।
यहां एक आन्नगार भी पाए गए थे , जहां अनाज को सुरक्षित रखा जाता था।
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